सार्वजनिक निजी भागीदारी (PUBLIC PRIVATE PARTNERSHIPS)


*आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण के दौर में विकास की गति को त्वरित करने के लिये एवं सार्वजनिक निजी सहयोग को बढ़ावा देने के लिये एक नयी अवधारणा पिछले दशक में तेजी से आर्थिक पटल पर उभरी है वह है- सार्वजनिक निजी भागीदारी। सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्यम से जहां एक तरफ विकास को प्रोत्साहन दिया जाता है तो दूसरी तरफ सरकार निजी सहयोग को बढ़ावा मिलता हैसामान्यतः समाजवादी प्रवृत्ति वाले देशों में सार्वजनिक निवेश मॉडल अपनाया जाता है, परन्तु संसाधनों के अभाव और अर्थव्यवस्था के समक्ष विद्यमान सामाजिक एवं आर्थिक चुनौतियों तथा इन चुनौतियों से निपटने में निजी क्षेत्र की पूरक भूमिका की संभावनाएं अक्सर सार्वजनिक निजी भागीदारी की ओर ले जाती हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आधारिक संरचनात्मक सुविधाओं की समुचित एवं पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता को उच्च आर्थिक विकास और संवृद्धि की एक शर्त के रूप में देखा जाता हैइसके लिए आवश्यकता है कि आधारिक संरचना में पर्याप्त निवेश की लेकिन मौलिक समस्या यह है कि सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में संसाधनों की कमी है और यह कमी उच्च आर्थिक विकास और संवृद्धि के रास्ते में एक बाधा है परन्तु कई बार यह भी देखने को मिलता है कि निजी क्षेत्र पूरक भूमिकाओं को निभाने में सक्षम होते हैंपरंतु व्यय प्रतिफल की निम्न दर निजी निवेश की संभावनाओं को हतोत्साहित करती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में निवेश और विकास को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को अतिरिक्त जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी और उसेधारिक संरचना निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करना होगा 


 


*यह मॉडल सरकार और निजी कम्पनियों के बीच रियायती समझौतों पर आधारिक एक दीर्घकालीन कम्पनियों के बीच रियायती समझौतों पर आधारित एक दीर्घकालीन साझेदारी की व्यवस्था है। इसके अंतर्गत निजी कम्पनियां USER Charges के आधार पर आधारिक संरचना से संबंधित सेवाओं की आपूर्ति को सुनिश्चित करने का आश्वासन देती है। यह मॉडल परियोजना के क्रियान्वयन एवं प्रचलन में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के मजबूत पक्षों को सुनिश्चित करता है। इसके अंतर्गत जोखिम और प्रतिफल पूर्व निर्धारित शर्तों के आधार पर आपस में वितरत होते हैं।


*जहां सरकार पर विभिन्न परियोजना की पहचान के साथ-साथ विभिन्न स्तरों पर क्लीयरेंसेस उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी होती है और साथ ही विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करतेहुए सरकार ऐसी परियोजना को व्यवहारिक रूप देने में अहम भूमिका निभाती है। आवश्यकता पड़ने पर संसाधनों की व्यवस्था सरकार के द्वारा की जाती है और परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहारिता को सुनिश्चित करने के लिए वहनीयता अंतराल फडिंग जैसी व्यवस्थाओं का भी सहारा लिया जाता है।


*इसके विपरीत परियोजनाओं के निर्माण एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र की कंपनियों के ऊपर होती है परन्तु इस मॉडल को निजी क्षेत्र के पर्याय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि निजी क्षेत्र की भागीदारी से स्वामित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसमें स्वामित्व सार्वजनिक क्षेत्र के पास इसमें स्वामित्व सार्वजनिक क्षेत्र के पास बना रहता है। स्पष्ट है कि पीपीपी मॉडल आधारिक संरचना स सवाधत परियोजना के प्रबंधन, तकनीकी और भारी मात्रा में पूंजी के साथ-साथ विशिष्ट प्रकार की दक्षता पूंजी के साथ-साथ विशिष्ट प्रकार की दक्षता और प्रबंधकीय विशेषता को सरकार के भरोसे छोड़ने के बजाय निजी क्षेत्र की पूरकता की संभावनाओं को तलाश करती है।


पीपीपी मॉडल के प्रारूप -


•OM मॉडल (Operate Mainte- nance Mode):-


इस मॉडल के अंतर्गत आधारिक संरचनाओं को उपलब्ध कराने और इससे संबंधित सुविधाओं को उपलब्ध कराने वाले संयंत्रों को निजी कंपनियों को सौंप दिया जाता है। तत्संबंधित निजी कंपनी पर ही प्रचालन और मरम्मत की जिम्मेदारी होती हैनिजी क्षेत्र की कंपनियों को ही इसके लिए अपेक्षित संसाधनों की व्यवस्था करनी पड़ती है। 


• BOT (Built Operate and Transfer करो) मॉडलः


भारत में यह मॉडल 1998 में सड़क परियोजनाओं के क्षेत्र में जसवंत सिंह कार्यदल की सिफारिश के आधार पर लागू किया गया।  इसके अंतर्गत आधारिक संरचनाओं एवं सुविधाओं से संबंधित परियोजनाओं जैसे सडक, हवाई अड्डा, ब्रिज इत्यादि को इन सड़कों पर 30 वर्ष या इससे अधिक समय के लिए निजी क्षेत्र को सुपुर्द किया जाता है कि वे अवसंरचनात्मक सुविधाओं के विकास को सुनिश्चित करते हुए उसका निर्माण करेंगे। निर्धारित अवधि या कार्यकाल के दौरान उसका प्रचालन भी उन्हीं के जिम्मे होगा और निर्धारित अवधि के पूरा होने के पश्चात उन परियोजनाओं को सरकार को हस्तांतरित कर दिया जायेगा। इस मॉडल के अंतर्गत परियोजनाओं से संबंधित सभी प्रकार के जोखिम का वहन निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा किया जायेगा। निर्धारित अवधि के दौरान शुल्कों की वसूली की जाती है। BOOT (Build on Operate & Trasfer) designed build finance operate & transfer (DBFOT), BTU (Build trasfer and use) ये सभी मॉडल BOT के घटक हैं। 


पीपीपी मॉडल -


पीपीपी मॉडल को अपनाए जाने के दो प्रमुख कारण माने जाते हैं-


* प्रथम कारण यह माना जाता है कि निजी क्षेत्र अपने साथ प्रौद्योगिकीय एवं|प्रबंधकीय श्रेष्ठता लेकर आएगा। निजी क्षेत्र के उच्च स्तरीय कौशल तथाविशेषज्ञता का लाभ परियोजना को प्राप्त होगा जो कि सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा उपलब्ध करा पाना प्राय: संभव नहीं होगा।


* दूसरा कारण यह है कि सरकार (सार्वजनिक क्षेत्र) किसी परियोजना अथवा सेवा के वित्तीयन के भार से बच जाती है। इस प्रकार पूंजी निवेश तो होता है परंतु सार्वजनिक क्षेत्र ऋण के भार से बच जाता है तथा निजी क्षेत्र ही बैंकों अथवा अन्य वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेता है। अथवा स्वयं अपनी पूंजी का निवेश करता है। परियोजना पूर्ण होने पर इसकी लागत इसके उपभोक्ता से वसूली जाती है।


सामान्यतया निजी कंपनियां किसी परियोजना को नियत समय सेनिर्मित करने, विकसित करने, रख-रखाव एवं संचालन हेतु संयुक्त रूप से एक विशिष्ट कंपनी बनाती है।


जिसे प्रायः स्पेशल पर्पज वेहिकल (एसपीवी) कहाजाता है। इसमें प्रायः विनिर्माता कंपनी, रखरखाव करने वाली कंपनी तथा ऋणदाता (बैंक) शामिल होते हैं। यदिसरकार भी इसमें निवेश करती हैं तो प्रायः वह भी एसपीवी में शामिल होती है। यह एसपीवी ही सरकार के साथ निर्माण एवं अनुरक्षण हेतु समझौता करती है।


पीपीपी मॉडल के सैद्धांतिक आधार -


12वीं पंचवर्षीय योजना के प्रारूप पत्र में पीपीपी मॉडल के सैद्धांतिक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है, जो निम्नवत हैं-


1. इस मॉडल का उद्देश्य आधारिक सुविधाओं के संदर्भ में अतिरिक्त क्षमता का सृजन करना है।


2. इसके माध्यम से गुणवत्ता युक्त सार्वजनिक सुविधाओं की बेहतर डिलीवरी (आपूर्ति) को सुनिश्चित किया जाये।


3. सार्वजनिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए निजी निवेश को सुनिश्चित किया जाये और इसके माध्यम से बेहतर कार्यकुशलता भी स्थापित की जाये।


4. पीपीपी मॉडल को सार्वजनिक हित में सृजित और क्रियान्वित किया जाये।


• प्रबंधन अनुबंध (Outsourcing अनुबंध):


इस समझौते के अंतर्गत निवेश निर्णय और स्वामित्व सार्वजनिक क्षेत्र या निर्णय और स्वामित्व सार्वजनिक क्षेत्र या सरकार के जिम्मे होता है जबकि निष्पादन और प्रचालन निजी क्षेत्र का निवेश संबंधी कोई दायित्व नहीं होता है इसलिये निजी क्षेत्र को निष्पादन एवं प्रचालन से संबंधित जोखिमों का वहन करना होता है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्रों की कार्यकुशलता में वृद्धि करना होता है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्रों की कार्यकुशलता में वृद्धि करना होता है जिससे कि प्रचालन लागत को कम किया जा सके और योजनाओं को निर्धारित समय के भीतर पूरा किया जा सके।


 


• संयुक्त उपक्रम (Joint venture): -


भारत में संयुक्त क्षेत्र की अवधारणा 1970 में ही दत्त समिति ने प्रतिपादित की।


संयुक्त क्षेत्र के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर किसी कम्पनी का गठन करते हैं जिनमें दोनों ही सहभागिता और अंशधारिता होती है। इसके परिणामस्वरूप ऐसी परियोजनाओं के लिए निजी क्षेत्र में उपलब्ध दक्षता, प्रबंधकीय कौशल, तकनीकी एवं उच्च प्रौद्योगिकी जानकारी का लाभ उठा पाना संभव होता है।


अभियांत्रिकी, खरीद और निर्माण अनुबंध-मॉडल (EPCM Model): अभियांत्रिकी, खरीद और निर्माण अनुबंध से संबंधित मॉडल को (Engineering, Procurement and Construction Contract) को राष्ट्रीय उच्च पथों के संदर्भो में अंतिम रूप दिया गया है। ऐसा ही| एक मॉडल अनुबंध भारतीय रेलवे के लिए समर्पित माल भाड़ा गलियारा के लिए भी तैयार किया जा रहा है। आरंभ में इस मॉडल को विकसित देशों ने अपनाया था। इसके अंतर्गत अनुबंध कर्ता कंपनी डिजाइन एवं निर्माण के लिए जिम्मेवार होती है। इसके जरिये परियोजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाले विलंब एवं परियोजना लागत में होने वाली वृद्धि की संभावनाओं को सीमित किया जा सकता है।


इसी के मद्देनजर सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर आधारित परियोजना की निगरानी के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किये गये हैं। इसके अंतर्गत द्विस्तरीय संस्थागत तंत्र की स्थापना की जानी है जो प्रभावी निगरानी को सुनिश्चित कर सकेगा। इस निगरानी-तंत्र के द्वारा मॉडल कनसेशनल एग्रीमेंट की शर्तों का अनुपालन सुनिश्चित किया जायेगा। इसके अंतर्गत अनुबंध में शामिल कंपनियों के द्वारा अनुपालन में बरती जाने वाली ढिलाई के संदर्भ में तिमाही रिपोर्ट जारी की जायेगी। इस रिपोर्ट को अवसंरचना से संबंधित से संबंधित मंत्रीमंडलीय समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा।


*BLT या BOLT ( बिल्ड लीज, ट्रांसफर या बिल्ड, ओन लीज ट्रान्सफर ):


यहभी पीपीपी मॉडल का एक तरीका है जिसके अन्तर्गत कोई निजी इकाई कोई प्रोजेक्ट जैसे हवाई अड्डा, मेट्रो रेलवे, पुल, बंदरगाह आदि की डिजाइनिंग तथा वित्तीय सुविधा प्रदान करती है पूरा करती है तथा इसे सरकार को बेच देती है, फिर लम्बी अवधि की लीज पर सरकार से ले लेती है तथा समयावधि के बाद सरकार को हस्तांतरित कर देती है।


BTU-Built, Transfer and Use-


BTU-Built, Transfer and Use (निर्माण हस्तांतरण तथा प्रयोग) इसके अन्तर्गत प्रोजेक्ट निर्मित करके, प्रोजेक्ट देने वाले को हस्तांतरित कर दिया जाता है फिर प्रयोग के लिए ले लिया जाता है। उल्लेखनीय है कि इसी समझौते के तहत म्यांमार से सिल्वेपोर्ट के पुनर्निर्माण का समझौता 120 मिलियन डॉलर में भारत ने किया है। DBFOT: डिजाइन, बिल्ड, फाइनेन्स, आपरेट तथा ट्रान्सफर भी पीपीपी मॉडल का एक प्रारूप है जिसमें निजी इकाइ शुरू से लेकर अन्त तक (DBFOT) सभी क्रियायें करती है, पूरी होने पर सरकार को हस्तांतरित कर देती है। राष्ट्रीय राजमार्ग का हैदराबाद-बैंगलूर सेक्सन इसके अन्तर्गत तैयार हो रहा है।


पीपीपी मॉडल के लिए संस्थागत ढांचा -


*अवसंरचना समिति ( आधारिक संरचना समिति );-


आधारिक संरचना के क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी पर आधारित परियोजनाओं पर सावधानीपूर्वक विचार करने और इसके अनुमोदन हेतु मजबूत संस्थागत ढांचे की स्थापना की दिशा में सरकार ने अनेकों कदम उठाये हैं जिसमें से एक प्रमुख कदम आधारिक संरचना समिति है।


अगस्त 2004 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में COI (Committee on Infrastructure) का गठन किया गया।


इस समिति से अपेक्षा की गई है कि वह नीतिगत पहलों के माध्यम से समयबद्ध तरीके से विश्वस्तरीय आधारिक संरचनाओं से संबंधित सुविधाओं का सृजन ओर उसकी आपूर्ति सुनिश्चित करेगी।


इसके साथ-साथ इस समिति का यह भी दायित्व होगा कि वह एक ऐसी पहल करेगी जिससे सार्वजनिक निजी भागीदारी को विस्तार मिल सके और इससे संबंधित परियोजनाओं के क्रियान्वयन और प्रगति का सही तरीके से मूल्यांकन किया जा सके जिससे कि समयबद्ध तरीके से लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।


• अवसंरचना पर केबिनेट समिति का गठन (CCI): इसका गठन जुलाई 2009 में किया गया। यह COI के स्थान पर गठित की गई है।


इस समिति से यह अपेक्षा की गई है कि यह अवसंरचना क्षेत्र से संबंधित नीतियों एवं परियोजनाओं की समीक्षा करेगी और साथ ही ऐसी परियोजनाओं के अनुमोदन की भी जिम्मेदारी इसकी होगी। कालान्तर में योजना आयोग के अधीन पीपीपी विचार विमर्श समिति का गठन किया गया और इसे दायित्व सौंपा गया कि वह ऐसी परियोजनाओं का चयन करें या संभावनाओं की तलाश करे जहां इस मॉडल को अपनाया जा सकता है और इसके बाद योजना आयोग उसकी व्यवहारिकता की जांच करेगा।


इसके बाद योजना आयोग उसकी व्यवहारिकता की जांच करेगा। इसके बाद एक बार पुनः उसे विचार विमर्श समिति के पास भेजा जायेगा और उस समिति के अनुमोदन के बाद केबिनेट समिति के पास परियोजना को भेजा जायेगा।


* निवेश पर केबिनेट समिति का गठनः -


दिसम्बर 2012 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में निवेश पर एक समिति का गठन किया गया। इस समिति के गठन का मुख्य उद्देश्य आधरिक संरचना के क्षेत्र में नियामकीय विलम्बन के कारण लम्बित पड़ी परियोजनाओं के संबंध में यथाशीघ्र निर्णय लेना है। इस समिति द्वारा 1000 करोड़ रुपये सेअधिक निवेश वाली परियोजनाओं के संदर्भ में निर्णय लिया जायेगा। 


* अवसंरचना ऋण निधिः -


आधारिक संरचना से संबंधित परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए अवसंरचना ऋण निधि का गठन लिया गया है। यह निधि आधारिक परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता को सुनिश्चित करेगी यह ऐसी परियोजना के पूरा होने और इसके प्रचालन के स्थिर होने के बाद इनके लिए फण्ड सुविधा उपलब्ध करायेगी जिससे बैंकों ये हैं एवं वित्तीय संस्थाओं द्वारा नई परियोजनाओं के लिए फंडिग आसान हो पायेगी। इस फण्ड का उद्देश्य घरेलु एवं विदेशी पशन. बीमा फडों के साथ-साथ अन्य स्रोतों से दीर्घकालीन ऋणों को श्रृंखलाबद्ध करना है।


* वहनीयता अंतराल फंडिगः-


सरकार ने पीपीपी मॉडल को प्रोत्साहित करने के पीपीपी मॉडल को प्रोत्साहित करने के लिए वहनीयता अंतराल फडिंग की दिशा में पहल की है। इसके माध्यम से प्रतिस्पर्धात्मक बोली अवसंरचना परियोजनाओं की आर्थिक वहनीयता सुनिश्चित करने की कोशिश की गई हैसाथ ही भागीदारी में सम्मिलित निजी कंपनियों के लिए उस न्यूनतम प्रतिफल को भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है जो निजी क्षेत्र को आधारिक संरचनाओं में निवेश के लिए प्रेरित कर सकेइसके अंतर्गत सरकार अवसंरचना परियोजनाओं के लिए कुल पूंजी लागत के 20% तक अनुदान सहायता के रूप में उपलब्ध करायेगी। इसके अलावा प्रायोजक मंत्रालय राज्य सरकार या परियोजना प्राधिकरण के द्वारा कुल परियोजना लागत का 20% अतिरिक्त अनुदान के रूप में उपलब्ध कराया जायेगा। इससे स्पष्ट है कि सरकार सार्वजनिक निजी भागीदारी के लिए संसाधनों की अनउपलब्धता पर ध्यान केन्द्रित कर रही है जिससे कि संसाधनों की कमी उच्च विकास में बाधा न बन जाये। 


*भारतीय अवसंरचना वित्त कंपनी निगम -


2006 में योजना आयोग की सलाह पर वित्त मंत्रालय के द्वारा भारतीय अवसंरचना वित्त कंपनी निगम (IIFCL) की स्थापना की गई। सामान्यतः अवसंरचना परियोजनाओं के लिए वित्त की उपलब्धता को सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसी परियोजनाएं पूंजी सघन होती हैं, उनका गर्भावधि काल लंबा होता है और इसलिए उन्हें कम लागत वाले दीर्घावधिक ऋणों की जरूरत होती है। सामान्यतः नई अवसंरचना–परियोजनाओं के लिए वित्तीयन में बीमा एवं पेंशन फंडों की उदासीनता और दीर्घावधिक ऋण जरूरतों को पूरा कर पाने में विद्यमान बांड -बाजारपरियोजनाओं के वित्तीयन के लिए वाणिज्यिक बैंकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें IIFCL की स्थापना की गई। इससे यह अपेक्षा की गई है कि यह लंबे गर्भावधि काल वाली अवसंरचना परियोजनाओं के लिए दीर्घकालीन वित्त की उपलब्धता को सुनिश्चित करेगा और परियोजना लागत का 20% तक इसके द्वारा वित्तीय सहायता के रूप में उपलब्ध करवाया जायेगा। IIFCL अवसंरचना क्षेत्र से सम्बद्ध परियोजनाओं के लिए प्रत्यक्षतः दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध करवाता है। इसके द्वारा बैंक एवं वित्त संस्थाओं के लिए पुनर्वित्त की सुविधा भी उपलब्ध करवायी जाती है। सरकार की ओर से गारंटी प्रदान किये जाने के कारण IIFCL के लिए घरेलू और बाह्य बाजारों से संसाधनों को जुटा पाना भी अपेक्षाकृत आसान होता है।


देश में आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू होने के बाद निजी निवेश को विकास में सक्रिय भूमिका निभाने के लिये अनेकों नीतिगत कदम उठाये गये। उनमें से ही एक कदम सार्वजनिक निजी भागीदारी का है।


सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्यम से सरकार देश में आधारभूत संरचना क्षेत्र को विकसित करके देश की विकास गति को त्वरित करना चाहती है। इस मॉडल के अंतर्गत देश में अनेक परियोजना चल रही है जिनको पूरा होना अभी शेष हैदिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो इसका उदाहरण है।


सार्वजनिक निजी भागीदारी परियोजना में भी जबवादेही तथा मितव्ययता की आवश्यकता है। अभी हाल ही में लिया गया निर्णय समय की मांग है कि पी. पी.पी. परियोजनाओं का लेखा परीक्षण तथा मूल्यांकन सी.ए.जी. द्वारा कराया जायेगा ऐसा होने पर इन परियोजनाओं की वित्तीय कुशलता में वृद्धि होगी जो अर्थव्यवस्था तथा इनके हित में है।


12वीं पंचवर्षीय योजना में पीपीपी मॉडल -


12वीं पंचवर्षीय योजना मानव विकास और जीवन की गुणवत्ता पर प्रभाव को ध्यान में रखते हुए सामाजिक क्षेत्र के विकास पर बल देती है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान निर्धारित भौतिक लक्ष्यों को केवल सार्वजनिक संसाधनों की बदौलत नहीं किया जा सकता। इसीलिये यह आवश्यक है योजना अवधि के अंत तक भौतिक और वित्तीय लक्ष्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए निजी क्षेत्र से संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित किया जाये। परंतु सामाजिक अवसंरचना क्षेत्र भौतिक अवसंरचना क्षेत्र से भिन्न है इसमें उपयोग चार्जेज पर आधारित रियायतों को अपना पाना संभव नहीं है।


यद्यपि इस संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। फिर भी सेवा लागत की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए दी जाने वाली रियायती निजी निवेश को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे सामाजिक क्षेत्र में निवेश को बढ़ाया जा सकेगा, परियोजनाओं में होने वाले अनावश्यक विलंब और इसके परिणामस्वरूप परियोजना लागत में होने वाली वृद्धि से बचा जा सकेगा। साथ ही दक्षता में सुधार और निष्पादन की बेहतर गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा सकता है


को सुनिश्चित किया जा सकता है12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान सामाजिक क्षेत्र में निवेश और कवरेज के विस्तार के साथ-साथ निजी सहभागियों की बेहतर भूमिका सुनिश्चित करने के लिए वित्तीय समर्थन योजना तैयार की जा रही हैइसके अंतर्गत आर्थिक दृष्टिकोण से कमजोर समूहों की सेवाओं की डिलेवरी की स्थिति में मॉडल सहमति समझौते के अनुसार राज्य सरकारों द्वारा पूंजी निवेश और अन्य लागत उपलब्ध करायी जायेगी।


सार्वजनिक निजी भागीदारी को सफल बनाने का प्रयास -


भारत में पीपीपी मॉडल को अपेक्षित रूप से सफल बनाने के लिए निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए ऐसे कदम उठाये जाने चाहिए जिनसे निजी क्षेत्र पीपीपी परियोजना में भागीदारी के लिए प्रोत्साहन हो। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में इस दिशा सरकार कदम भी उठा रही हैऔर रेलवे और मेट्रो में सार्वजनिक निजी भागीदारी को बढ़ावा दे रही है। भारत में पीपीपी मॉडल को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत है-


* पीपीपी मॉडल में परियोजना के निर्धारित समय सीमा के भीतर समाप्त होने के लिए आवश्यक है कि निजी क्षेत्र से कोई समझौता करने से पूर्व भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी, परमिट इत्यादि से संबंधित मुद्दे सुलझा लिए जाने चाहिए।


* गंभीर पक्षकारों के प्रस्तावों को ही स्वीकार किया जाना चाहिएसरकार को ऐसी कंपनियों के प्रस्तावों पर विचार करना चाहिए जो संबंधित क्षेत्र में अनुभव, कौशल एवं दक्षता रखती हो तथा मात्र मुनाफे की आशा में प्रस्ताव प्रस्तुत करने वालों को नीलामी आदि प्रक्रिया में शामिल नहीं करना चाहिए।


* सरकार को परियोजना के दौरान संभाव्य अप्रत्याशित समस्याओं जैसे किसी कानूनी प्रावधान में परिवर्तन अथवा न्यायालय के किसी निर्णय आदि के लिए तैयार रहना चाहिए तथा ऐसी कंपनियों प्रस्तावों को महत्व देना चाहिए जो न केवल ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम हो अपितु ऐसी परिस्थितियों में सरकार द्वारा किए गए आपात उपायों में सहयोग करें।


* सरकार को पीपीपी परियोजना से संबंधित किसी प्रस्ताव को आमंत्रित करने से पूर्व संबंधित परियोजना में अपेक्षित दीर्घकालीन वित्तीय तथा निवेश का आकलन कर लेना चाहिए ताकि अपेक्षित वित्तीय के स्रोतों का पता लगाया जा सके साथ ही उपलब्धता एवं आवश्यकता के बीच का अंतर स्पष्ट हो सके।